
श्रीमद्भागवत कथा के चौथे दिन श्रीकृष्ण जन्मोत्सव
श्रीक्षेत्र शुक्रताल (अनिलकुमार पालीवाल)… धर्मप्रेमी प्रायः श्रद्धा और भक्ति में इतने लीन व तल्लीन हो जाते हैं कि उन्हें स्वयं का भी भान नहीं रहता। इसका उदाहरण देते हुए पंडित हरिनारायण वैष्णव ने भक्त गोरा कुंभार की भक्ति की तल्लीनता का दृश्य श्रोताओं के समक्ष प्रस्तुत कर समझाया कि सच्चा भक्त कैसा होना चाहिए। संत नामदेव भी भक्तों की पंक्ति में सदैव अग्रणी रहे। असीम भक्ति से परिपूर्ण संत नामदेव ने साताईस बार भगवान के दर्शन किए, फिर भी कभी इसका घमंड नहीं किया। यह सत्यता आज की दिखावटी भक्ति की दुनिया में दुर्लभ है, ऐसा उन्होंने श्रोताओं को स्पष्ट रूप से बताया। उन्होंने कहा कि भूतदय का सद्गुण संतों से ही सीखना चाहिए। संत नामदेव के श्वान-प्रेम से साक्षात श्रीविठ्ठल भगवान का दर्शन प्राप्त हुआ था, यह प्रसंग भी उन्होंने सुनाया।
संतश्री वैष्णव ने भक्त और भगवान का संबंध अटूट है, इस संदर्भ में अनेक दृष्टांत श्रोताओं को सुनाए। उन्होंने कहा कि सभी भक्त भगवान को समान प्रिय होते हैं और श्रोताओं से परमेश्वर के साथ अपना संबंध जोड़ने का आग्रह किया। जीवन में चार दान का विशेष महत्व बताते हुए उन्होंने कहा कि अन्नदान सेवा कार्य में सदैव आगे रहकर जीवन को सुखमय व सफल बनाना चाहिए।
उन्होंने स्पष्ट कहा कि आज के समय में नारी-चरित्र का बहुत अवमूल्यन हो रहा है। इस पर प्रकाश डालते हुए पंडितजी ने महिलाओं को प्रतिदिन तुलसी की पूजा व सेवा करने की बात कही। उन्होंने कहा कि यदि प्राचीन सभ्यता को अपनाया जाए तो संस्कारों की कमी नहीं रहेगी और जीवन के कार्यों में कभी कोई बाधा नहीं आएगी। वर्तमान स्थिति में बहुएँ कैसे आचरण करती हैं, इसका प्रत्यक्ष चित्रण भी उन्होंने श्रोताओं के सामने प्रस्तुत किया और कहा कि बेटियों को शिक्षा के साथ-साथ संस्कार की भी शिक्षा देनी चाहिए।
भागवत ग्रंथ में वर्णित पतिव्रता नारी सांडली की कथा उन्होंने विस्तार से सुनाई और कहा कि पतिव्रता नारी में अद्भुत शक्ति होती है, जिसका पौराणिक और शास्त्रीय महत्व है। आज की परिस्थितियों में बेटियों को जागरूक होना चाहिए और माता-पिता के संस्कारों को अपने जीवन में आत्मसात करके अपने जीवन को धन्य बनाना चाहिए।
इस अवसर पर कथा के अंत में श्रीकृष्ण जन्मोत्सव का आयोजन बड़े ही आनंदमय वातावरण में संपन्न हुआ। श्रीमद्भागवत कथा के इस कार्यक्रम में मुख्य यजमान झाडोत परिवार द्वारा आरती की गई।
